दिल्ली की सियासत में बड़ा मोड़ तब आया जब Rouse Avenue Court ने दिल्ली शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल समेत 22 अन्य आरोपियों को 27 फरवरी को बरी कर दिया। इस फैसले के बाद राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों, खासकर Central Bureau of Investigation (सीबीआई) पर तीखा हमला बोला।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिब्बल ने सवाल उठाया—“अरविंद केजरीवाल 126 दिनों तक जेल में रहे, इसका जिम्मेदार कौन है?” उन्होंने यह भी पूछा कि “मनीष सिसोदिया 503 दिन जेल में रहे, उसकी भरपाई कौन करेगा?”
कोर्ट का फैसला और सियासी हलचल
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने शराब नीति से जुड़े मामले में सबूतों के अभाव में केजरीवाल सहित 22 लोगों को राहत दी। अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। विपक्ष इसे “सत्य की जीत” बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष की ओर से अभी विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इस फैसले के बाद सिब्बल ने कहा कि जांच एजेंसियों को पहले से पता था कि दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, फिर भी मामले को लंबा खींचा गया।
“सीबीआई के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे”
कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि सीबीआई को इस बात की भली-भांति जानकारी थी कि उसके पास ठोस सबूत नहीं हैं। इसके बावजूद जांच को लगातार आगे बढ़ाया गया।
उन्होंने कहा,
“अगर एजेंसी के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे, तो इतने लंबे समय तक लोगों को जेल में क्यों रहना पड़ा?”
सिब्बल का दावा है कि जांच प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा किया गया, जिससे संबंधित नेताओं को राजनीतिक और व्यक्तिगत नुकसान झेलना पड़ा।
जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल
सिब्बल ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा समय में एजेंसियां “जिसे चाहें उसे निशाना बना रही हैं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। उनके अनुसार, विपक्षी नेताओं को लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में उलझाकर रखा जाता है और बाद में अदालत में मामला टिक नहीं पाता।
P. Chidambaram का उदाहरण
अपने आरोपों को मजबूती देने के लिए सिब्बल ने कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के मामलों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि चिदंबरम के खिलाफ भी लंबे समय तक जांच चली, लेकिन अंत में आरोप साबित नहीं हो सके।
सिब्बल ने कहा कि यह एक पैटर्न बनता जा रहा है—
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पहले आरोप लगाया जाता है
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फिर लंबी जांच चलती है
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व्यक्ति महीनों या सालों तक जेल में रहता है
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अंत में अदालत में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते
“जेल में बिताए समय की भरपाई कौन करेगा?”
सिब्बल का सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि जिन नेताओं को अदालत ने बरी कर दिया, उनके जेल में बिताए समय की जिम्मेदारी कौन लेगा?
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाता है और बाद में वह निर्दोष साबित होता है, तो इसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
राजनीतिक असर क्या होगा?
इस फैसले का असर आने वाले चुनावों और राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ एक नैरेटिव के रूप में पेश कर सकता है, जबकि सत्तापक्ष इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बताएगा।
दिल्ली की राजनीति में यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है। खासकर तब, जब जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो रही है।
आगे क्या?
अदालत के फैसले के बाद अब यह देखना होगा कि क्या जांच एजेंसियां इस निर्णय के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करती हैं या नहीं। वहीं राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
कपिल सिब्बल ने साफ कहा है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण है और अगर लोगों का भरोसा डगमगाता है तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत है।
निष्कर्ष
दिल्ली शराब नीति मामले में अदालत के फैसले ने राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। कपिल सिब्बल के सवाल—“126 दिन जेल में रहे केजरीवाल, जिम्मेदार कौन?”—ने इस मुद्दे को और तीखा बना दिया है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और जांच एजेंसियां इन आरोपों का क्या जवाब देती हैं और आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।

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