मैनपुर। रंगों और उल्लास के पर्व होली को जहां देशभर में गुलाल, रंग और अबीर के साथ मनाया जाता है, वहीं गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक में यह त्योहार एक अनूठी और आध्यात्मिक परंपरा के साथ मनाया जाता है। यहां होली रंगों से नहीं, बल्कि यज्ञ की पवित्र भभूति (हवन की राख) से खेली जाती है। प्रकृति संरक्षण, गौसेवा और विश्व शांति के संदेश के साथ शुरू हुआ यह आयोजन अब दो दशकों से अधिक समय से निरंतर जारी है और हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
इस वर्ष भी कांडसर स्थित गौशाला में पांच दिवसीय गौ मेला एवं विश्व शांति यज्ञ का शुभारंभ भव्य गौ शोभायात्रा के साथ किया गया। आयोजन की अगुवाई संत परंपरा से जुड़े बाबा उदयनाथ के सान्निध्य में की जा रही है, जिनके अनुयायियों की संख्या हजारों में है।
गौ माता के स्वागत से हुई शुरुआत
आयोजन की शुरुआत परंपरानुसार गौ माता के स्वागत से की गई। दो दिन पूर्व क्षेत्र भ्रमण पर निकाली गई गौ माता की विधिवत वापसी हुई। डूमाघाट पंचायत कार्यालय से निकली यह शोभायात्रा लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलकर कांडसर गौशाला पहुंची।
पूरे मार्ग में सफेद नए कालीन बिछाए गए थे। श्रद्धालु मार्ग के दोनों ओर खड़े होकर गौ माता के दर्शन कर रहे थे। कई श्रद्धालु गौ माता के चरणों के नीचे आकर “गौ पग बाधा” का पुण्य लाभ लेने के लिए लेट गए। मान्यता है कि गौ माता के चरणों का स्पर्श होने से शारीरिक कष्ट, मानसिक विकार और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।
यात्रा के दौरान भजन-कीर्तन, शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। महिलाएं मंगल गीत गा रही थीं, वहीं युवाओं ने शोभायात्रा को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में सहयोग किया।
इस वर्ष प्रकृति भी बनी अतिथि
इस बार आयोजन की विशेषता यह रही कि गौ माता के साथ प्रकृति के प्रतीक के रूप में अंबु वृक्ष, अर्क पौधा और वायु को भी अतिथि बनाया गया है। आयोजन समिति का कहना है कि यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश भी देती है।
अंबु वृक्ष को जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक माना गया है, अर्क पौधा औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्व रखता है, और वायु जीवन का आधार है। इन सभी तत्वों को अतिथि के रूप में शामिल कर यह संदेश दिया जा रहा है कि मानव जीवन प्रकृति के बिना अधूरा है।
ब्रह्ममुहूर्त से शुरू हुआ हवन
आयोजन के तहत ब्रह्ममुहूर्त से ही वैदिक विधि-विधान के साथ विश्व शांति यज्ञ प्रारंभ हो गया। विद्वान आचार्यों द्वारा मंत्रोच्चार के साथ हवन कुंड में आहुति दी जा रही है। पांच दिनों तक निरंतर चलने वाले इस यज्ञ में देश और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए साधु-संत, गौसेवक, हिंदू संगठन और श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
पूर्णिमा के दिन यज्ञ की पूर्णाहुति दी जाएगी। उसी दिन हवन की भस्म को पवित्र तिलक के रूप में लगाया जाएगा और उसी भभूति से होली खेली जाएगी। यहां रंग या रासायनिक गुलाल का उपयोग नहीं किया जाता। पूरी होली शांतिपूर्ण, आध्यात्मिक और मर्यादित वातावरण में संपन्न होती है।
भस्म से होली खेलने की अनूठी परंपरा
मैनपुर ब्लॉक की यह परंपरा पिछले लगभग 20 वर्षों से चली आ रही है। बाबा उदयनाथ के अनुयायियों द्वारा प्रारंभ की गई इस पहल का उद्देश्य समाज में नैतिक मूल्यों, गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है।
भक्तों का मानना है कि हवन की भस्म केवल राख नहीं, बल्कि वैदिक मंत्रों से पवित्र की गई ऊर्जा का प्रतीक है। जब श्रद्धालु एक-दूसरे को भस्म का तिलक लगाते हैं, तो वे शांति, सद्भाव और समरसता का संदेश देते हैं। यहां किसी प्रकार का हुड़दंग, तेज संगीत या रंगों की बर्बादी नहीं होती।
हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता
आयोजन में बाबा उदयनाथ के लगभग 20 से 30 हजार अनुयायी शामिल होते हैं। इसके अलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से हिंदू संगठन, स्वयंसेवी समूह, संघ से जुड़े कार्यकर्ता और गौसेवक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
गौशाला परिसर में विशाल पंडाल लगाए गए हैं। श्रद्धालुओं के ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था की गई है। तीन दिनों तक विशेष भंडारे का आयोजन किया गया है, जिसमें प्रतिदिन हजारों लोगों को प्रसाद वितरित किया जा रहा है।
गौ मेला: आस्था और सेवा का संगम
पांच दिवसीय गौ मेले में गौ सेवा, गौ संरक्षण और जैविक खेती पर विशेष चर्चा सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं। पशुपालकों को आधुनिक तकनीक, गौ आधारित उत्पादों और जैविक खाद के उपयोग के बारे में जानकारी दी जा रही है।
गौशाला में सैकड़ों गौवंश की सेवा की जाती है। आयोजन समिति का कहना है कि गौ सेवा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का माध्यम भी है।
आध्यात्मिकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
आज जब होली के दौरान पानी की बर्बादी और रासायनिक रंगों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, ऐसे समय में मैनपुर की यह पहल एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। हवन की भस्म से होली खेलने से न तो जल की बर्बादी होती है और न ही किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता है।
आयोजन समिति का कहना है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना ही सच्ची होली है। यही कारण है कि इस बार अंबु वृक्ष, अर्क पौधा और वायु को प्रतीकात्मक रूप से अतिथि बनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है।
सुरक्षा और व्यवस्था के विशेष इंतजाम
हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति को देखते हुए प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए स्वयंसेवकों की टीम बनाई गई है। चिकित्सा सुविधा और प्राथमिक उपचार केंद्र भी स्थापित किए गए हैं।
पूर्णिमा को होगी पूर्णाहुति
पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन का समापन पूर्णिमा के दिन यज्ञ की पूर्णाहुति के साथ होगा। पूर्णाहुति के पश्चात हवन की पवित्र राख को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाएगा। श्रद्धालु एक-दूसरे को भस्म का तिलक लगाकर होली की शुभकामनाएं देंगे।
सामाजिक समरसता का संदेश
यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। यहां किसी प्रकार का जाति, वर्ग या क्षेत्रीय भेदभाव नहीं होता। सभी लोग एक साथ बैठकर भंडारा ग्रहण करते हैं और एक-दूसरे को तिलक लगाकर भाईचारे का संदेश देते हैं।
निष्कर्ष
मैनपुर ब्लॉक की यह अनूठी होली परंपरा आध्यात्मिकता, गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में होली रंगों और शोर-शराबे के साथ मनाई जाती है, वहीं यहां शांति, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति सम्मान के साथ होली खेली जाती है।
हवन की भस्म से खेली जाने वाली यह होली न केवल एक धार्मिक परंपरा है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देती है कि त्योहार केवल आनंद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को सहेजने का अवसर भी हैं।
मैनपुर की यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है—कि उत्सव मनाएं, लेकिन प्रकृति और परंपरा के साथ संतुलन बनाकर।
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