नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। मामला एक वायरल वीडियो से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर उन्हें एक खास समुदाय के लोगों की ओर राइफल से निशाना साधते और गोली चलाते हुए दिखाया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों की जांच संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले हाईकोर्ट द्वारा की जा सकती है।
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष आया, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। पीठ ने याचिकाकर्ताओं को पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को कहा और संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मामले की शीघ्र सुनवाई पर विचार करने का अनुरोध भी किया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: संवैधानिक नैतिकता का पालन जरूरी
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह राजनीतिक दलों से अपील करती है कि वे पारस्परिक सम्मान और संयम बनाए रखें तथा अपनी बात संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रखें। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव के समय सुप्रीम कोर्ट को “राजनीतिक लड़ाई का मैदान” बनाना उचित नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी से पूछा कि उन्हें हाईकोर्ट जाने से क्या रोकता है। इस पर सिंघवी ने तर्क दिया कि मामला संविधान के मूल सिद्धांतों—शपथ, अनुच्छेद 14, 15 और 21—से जुड़ा है और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करना उचित है।
एसआईटी गठन की मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी मांग की गई कि मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जाए। इस पर अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट आवश्यकता पड़ने पर राज्य से बाहर के अधिकारियों को शामिल करते हुए एसआईटी का गठन कर सकता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों के साथ-साथ यदि मानवाधिकार उल्लंघन का प्रश्न उठता है, तब भी हाईकोर्ट प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम है। अदालत ने कहा कि हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट लाना एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है और इससे संवैधानिक ढांचे पर असर पड़ सकता है।
“हाईकोर्ट का सम्मान करें”
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कमर्शियल और पर्यावरण संबंधी मामलों में भी हाईकोर्ट की भूमिका को कमतर आंका जा रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट के जज वर्षों का अनुभव रखते हैं और उन्हें संवैधानिक मामलों पर निर्णय देने का अवसर मिलना चाहिए।
जब याचिकाकर्ताओं की ओर से यह आग्रह किया गया कि असम हाईकोर्ट के बजाय किसी अन्य हाईकोर्ट में जाने की अनुमति दी जाए, तो पीठ ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि यह “फोरम शॉपिंग” जैसा प्रतीत होता है। अदालत ने दोहराया कि सिस्टम पर भरोसा रखना जरूरी है।
आदेश में क्या कहा गया?
विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सभी मामलों पर अधिकार क्षेत्र वाला हाईकोर्ट प्रभावी निर्णय देने में सक्षम है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसे इस स्तर पर हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। याचिकाओं को संबंधित हाईकोर्ट में जाने की स्वतंत्रता देते हुए अदालत ने मुख्य न्यायाधीश से शीघ्र सुनवाई पर विचार करने का अनुरोध किया।
पृष्ठभूमि
यह याचिका कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) की ओर से दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए कुछ बयान और हालिया वीडियो कथित रूप से एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले हैं।
याचिका में कहा गया कि 7 फरवरी 2026 को असम भाजपा के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल से एक वीडियो साझा किया गया, जिसमें कथित तौर पर मुख्यमंत्री को हथियार चलाते हुए दिखाया गया है और वीडियो में एक विशेष समुदाय के लोगों की एनिमेटेड छवि दिखाई गई। याचिका में दावा किया गया कि वीडियो में “पॉइंट ब्लैंक शॉट” और “नो मर्सी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जो कथित तौर पर डर और दुश्मनी का संदेश देते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित बयानों और दृश्य सामग्री को व्यापक रूप से प्रसारित किया गया, जिससे समाज में वैमनस्य और भय का वातावरण पैदा हो सकता है। हालांकि, इन आरोपों पर अभी न्यायिक परीक्षण होना बाकी है और संबंधित तथ्यों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

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