धान खरीदी पर सियासी संग्राम: बैज बोले– भाजपा नेताओं की भी भुगतान सूची करें सार्वजनिक
रायपुर। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी और अंतर राशि को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर जारी एक पोस्टर के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। पोस्टर में कुछ कांग्रेस नेताओं और उनके परिजनों को धान बिक्री के एवज में हुए भुगतान का उल्लेख किया गया, जिस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
दीपक बैज ने इसे भाजपा की “स्तरहीन राजनीति” करार देते हुए कहा कि किसान होना कोई अपराध नहीं है और यदि कोई नेता खेती करता है तो उसे अपनी उपज का मूल्य मिलना उसका अधिकार है, न कि किसी प्रकार की खैरात।
पोस्टर से शुरू हुआ विवाद
प्रदेश की सियासत तब गरमा गई जब भाजपा की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट साझा किया गया, जिसमें कुछ कांग्रेस नेताओं और उनके परिजनों को धान बेचने पर मिले भुगतान का ब्यौरा दर्शाया गया।
इस पोस्ट के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की गई कि कांग्रेस के नेता स्वयं धान बेचकर लाभ ले रहे हैं और दूसरी ओर सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं।
कांग्रेस ने इसे राजनीतिक द्वेष से प्रेरित कदम बताया है।
बैज का पलटवार: भाजपा नेताओं की भी जानकारी सार्वजनिक हो
दीपक बैज ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि भाजपा कांग्रेस नेताओं की धान बिक्री की जानकारी सार्वजनिक कर सकती है, तो उसे अपने नेताओं का भी विवरण साझा करना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भाजपा में किसान नहीं हैं? क्या भाजपा के नेताओं ने धान नहीं बेचा? यदि बेचा है, तो उन्हें कितना भुगतान मिला—यह भी जनता के सामने लाया जाना चाहिए।
बैज ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण देव, पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, अजय चंद्राकर और धरमलाल कौशिक समेत अन्य नेताओं के नाम लेते हुए कहा कि यदि पारदर्शिता की बात की जा रही है, तो यह सबके लिए समान रूप से लागू होनी चाहिए।
“खैरात नहीं,मेहनत की कमाई”
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि धान का मूल्य किसानों के खून-पसीने की कमाई है। इसे किसी सरकार की दया या उपकार के रूप में प्रस्तुत करना गलत है।
उन्होंने कहा कि किसान खेत में दिन-रात मेहनत करता है, तब जाकर फसल तैयार होती है। ऐसे में उसकी उपज का उचित मूल्य मिलना उसका अधिकार है।
बैज ने आरोप लगाया कि भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर असली सवालों से ध्यान भटकाना चाहती है।
7 लाख किसानों का धान नहीं खरीदा – आरोप
कांग्रेस की ओर से यह भी दावा किया गया कि राज्य में करीब 7 लाख किसानों का धान सरकार ने नहीं खरीदा।
बैज ने कहा कि कई किसानों से रकबा सरेंडर करवाया गया, जिससे वे अपनी पूरी उपज नहीं बेच सके। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने अंतर राशि के भुगतान में भी गड़बड़ी की है और किसानों को घोषित दर के अनुरूप पूरी राशि नहीं दी गई।
अंतर राशि की गणना पर विवाद
धान खरीदी में घोषित दर और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के बीच के अंतर को लेकर भी विवाद गहराया है।
बैज का कहना है कि सरकार ने 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान का दावा किया, लेकिन समर्थन मूल्य में पिछले दो वर्षों में 117 और 89 रुपए की वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर 206 रुपए की बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए अंतर राशि की गणना 3286 रुपए के आधार पर होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि यदि 21 क्विंटल प्रति एकड़ की खरीदी को आधार माना जाए, तो प्रति एकड़ करीब 3906 रुपए किसानों को कम मिले हैं।
2622 करोड़ रुपए कम भुगतान का दावा
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस वर्ष लगभग 141 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई है।
उनके अनुसार यदि अंतर राशि की गणना सही आधार पर की जाए, तो किसानों को कुल मिलाकर करीब 2622 करोड़ रुपए कम दिए गए हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि यह राशि किसानों के अधिकार की है और सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि गणना किस आधार पर की गई।
भाजपा की रणनीति या पारदर्शिता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धान खरीदी का मुद्दा छत्तीसगढ़ की राजनीति में हमेशा अहम रहा है। राज्य की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, और धान यहां की प्रमुख फसल है।
ऐसे में धान की कीमत, समर्थन मूल्य और अंतर राशि जैसे मुद्दे सीधे किसानों से जुड़े होते हैं।
भाजपा का कहना है कि भुगतान की जानकारी सार्वजनिक करना पारदर्शिता का हिस्सा है, जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित कदम बता रही है।
किसानों के बीच बढ़ती चिंता
धान खरीदी को लेकर चल रही बयानबाजी के बीच किसान समुदाय में भी असमंजस की स्थिति है। कई किसान यह जानना चाहते हैं कि अंतर राशि की गणना किस प्रकार की गई और उन्हें पूरी रकम मिली या नहीं।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह चर्चा भी है कि यदि राजनीतिक दल इस मुद्दे को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखेंगे, तो असली समस्या का समाधान नहीं हो पाएगा।
सियासी बयानबाजी और संभावित असर
राज्य में आगामी राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए धान खरीदी का मुद्दा और गरमा सकता है। दोनों प्रमुख दल इसे किसानों के हित से जोड़कर अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि सरकार स्पष्ट आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करती है, तो विवाद शांत हो सकता है। अन्यथा यह मुद्दा लंबे समय तक राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहेगा।
निष्कर्ष
धान खरीदी और अंतर राशि को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासी घमासान तेज हो चुका है। एक ओर भाजपा भुगतान की जानकारी सार्वजनिक कर पारदर्शिता का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस इसे किसानों के मुद्दे से ध्यान भटकाने की रणनीति बता रही है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर किस प्रकार आगे बढ़ते हैं—क्या पारदर्शिता और तथ्यों के आधार पर समाधान निकलेगा या फिर बयानबाजी का दौर और तेज होगा।
किसानों के हित और उनके अधिकारों की रक्षा इस पूरे विवाद का केंद्र है, और यही तय करेगा कि राजनीतिक लाभ किसे मिलता है।
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